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भोजली पर्व में दिखी छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति,कान में भोजली लगाकर बनाया मितान

जांजगीर चांपा जिले में रविवार को छत्तीसगढ़ का पारंपरिक मितान तिहार और भोजली पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया। इस दौरान महिलाओं, बच्चों और युवाओं ने पूरे उत्साह के साथ भोजली की पूजा की और वर्षों पुरानी परंपरा को निभाया। आधुनिकता के दौर में जहां कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, वहीं जांजगीर में आज भी लोग भोजली के जरिए अपनी संस्कृति को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

भोजली पर्व की शुरुआत पंचमी के दिन होती है।

 

महिलाएं अपने घर के पूजा स्थल पर टोकरी में मिट्टी भरकर गेहूं के दाने बोती हैं। इसके बाद भोजली को अंधेरे कमरे में रखकर नौ दिनों तक दीप जलाया जाता है और रोजाना पूजा-अर्चना के साथ उसकी सेवा की जाती है। इस दौरान परिवार की खुशहाली, अच्छी फसल और देश-प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। राखी के बाद भादो महीने के पहले दिन भोजली का तालाब में विसर्जन किया गया। विसर्जन के बाद टोकरी में उगी पीली-पीली भोजली की बालियों को लोग अपने साथ घर लेकर आए। इसके बाद एक-दूसरे के कान में भोजली लगाकर मितान यानी पक्की दोस्ती बनाई गई। बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद भी लिया गया।

शादी के बाद बेटियां भी पहुंचती हैं मायके

 

भोजली पर्व की सबसे खास बात यह है कि शादी के बाद ससुराल चली गई बेटियों को भी इस पर्व के दौरान मायके बुलाया जाता है। बहू-बेटियां और परिवार के सभी सदस्य मिलकर भोजली की पूजा करते हैं। इस दौरान घर-परिवार में उत्साह का माहौल रहता है और पुरानी यादें भी ताजा होती हैं।

 

 

स्थानीय मान्यता के अनुसार भोजली को माता गंगा के समान पवित्र और पूजनीय माना जाता है। यही वजह है कि भोजली को एक-दूसरे को देकर मितान बनाने की परंपरा आज भी लोगों के बीच कायम है। खासकर युवा वर्ग अपने सबसे करीबी दोस्त को भोजली देकर जीवनभर दोस्ती निभाने का संकल्प लेता है।

भोजली के जरिए पुरानी रंजिश भी होती है खत्म

 

बुजुर्गों के अनुसार भोजली केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं है, बल्कि यह लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का भी माध्यम है। भोजली विसर्जन के बाद इसे अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, छोटे-बड़ों और यहां तक कि ऐसे लोगों को भी दिया जाता है, जिनसे किसी बात को लेकर पुरानी नाराजगी या विवाद रहा हो। भोजली देने के साथ पुरानी रंजिश को खत्म कर नई शुरुआत करने की परंपरा है। नगर पालिका जांजगीर के उपाध्यक्ष मोहन यादव और बैगा छत राम कश्यप सहित स्थानीय लोगों ने बताया कि भोजली पर्व लोगों को आपस में जोड़ने और सामाजिक भाईचारा बढ़ाने का काम करता है।

सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश

 

छत्तीसगढ़ में भोजली की परंपरा का सामाजिक महत्व भी काफी बड़ा है। पुराने समय में भोजली के माध्यम से गांव में एकता और सामाजिक समरसता बनाए रखने का प्रयास किया जाता था। जात-पात और ऊंच-नीच की भावना को दूर कर सभी लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने में इस परंपरा की अहम भूमिका रही है।
जांजगीर-चांपा में आज भी लोग इसी परंपरा को पूरे उत्साह के साथ निभा रहे हैं। लोगों का कहना है कि भोजली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पहचान, दोस्ती, भाईचारे और सामाजिक एकता की परंपरा है, जिसे आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।

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